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ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग कथा हिंदी में Omkareshwar jyotirlinga history and story in hindi

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ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा
 
ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के स्थापना की कथा यह ज्योतिर्लिंग शिवपुरी नामक स्थान पर स्थित है ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दो स्वरूपों में ओम्कारेश्वर और अमलेश्वर यह ज्योतिर्लिंग इस तीर्थ में कैसे प्रकट हुई तथा इसकी स्थापना कैसे हुई हम आपको बताएंगे इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से शिव पुराण के कोटि रुद्र संहिता के 18 अध्याय में इसका वर्णन मिलता है एक बार देव ऋषि नारद घूमते हुए विंध्य पर्वत पर पहुंच गए विंध्य ने बड़े आदर के साथ उनका स्वागत किया और कहा कि मैं सर्वगुण संपन्न हूं मेरे पास हर प्रकार की संपदा है किसी वस्तु की कमी नहीं है इस प्रकार की भावना मन में लिए विंध्याचल नारद मुनि के समक्ष खड़े हो गए अहंकार नाशक श्री नारद जी विंध्याचल की अभिमान से भरी बातें सुनकर लंबी सांस खींचते हुए चुपचाप खड़े रहे विंध्य पर्वत ने पूछा आपको मेरे पास कौन सी कमी दिखाई दी आपने किस कमी को देखकर लंबी साथ खींची नारद जी ने विंध्याचल को बताया कि तुम्हारे पास सब कुछ है सुमेरु पर्वत बहुत ऊंचा है उस पर्वत का विभाग देवताओं के लोको तक पहुंचा हुआ है मुझे लगता है तुम्हारे शिखर के भाग वहां तक कभी नहीं पहुंच पाएंगे यह कहकर नारद जी वहां से चले गए नारद जी की बात सुनकर विंध्याचल को बहुत पछतावा हुआ वह दुखी होकर मन ही मन शोक करने लगा भगवान शिव की आराधना करने का निश्चय किया जहां पर साक्षात ओमकार विद्यमान है स्थान पर पहुंचकर उसने प्रसंता और प्रेम पूर्वक क्योंकि पार्थिव मूर्ति बनाई और 6 महीने तक लगातार उसका पूजन किया उसकी कठोर तपस्या को देख कर भगवान शिव ने प्रसन्न होकर विंध्याचल को अपने दिव्य स्वरूप के दर्शन कराएं और बोले बिन मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं मैं अपने भक्तों को उनका मनचाहा वर प्रदान करता हूं इसलिए तुम वर मांगो दिल ने कहा तब दिल ने कहा भगवान अगर आप पसंद है तो मुझे वह अभीष्ट बुद्धि प्रदान करें जो अपने कार्यों को सिद्ध करने वाले हो विंध्य पर्वत की याचना को पूरा करते हुए भगवान शिव ने कहा कि पर्वतराज मैं तुम्हें वह उत्तम हुआ प्रदान करता हूं तुम जिस प्रकार का काम करना चाहो कर सकते हो जब भगवान शिव ने बिंदु को उत्तम वर दे दिया उसी समय कुछ देवगढ़ तथा ऋषि गढ़वी वहां आ गए उन्होंने भी भगवान शंकर की विधिवत पूजा की और उनकी स्तुति करने के बाद उनसे कहा आप हमेशा के लिए यहां स्थिर होकर निवास करें देवताओं की बात से भगवान शिव को बड़ी प्रसन्नता हुई लोक कल्याण करने वाले भगवान शिव ने उस ऋषि हो तथा देवताओं की बात को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लिया वहां स्थित ओमकार लिंग 2 रूपों में विभक्त हो गया प्रणाम के अंतर्गत जो सदाशिव दमाद हुए उन्हें ओमकारेश्वर अर्थात ओमकार नाम से जाना जाता है इसी प्रकार पार्थिव मूर्ति में जो ज्योति प्रतिष्ठित हुई थी वह परमेश्वर लिंग के नाम से विख्यात हुई रामेश्वर लिंग को अमलेश्वर लिंग भी कहा जाता है।
 
                                                            ॐ हर हर महादेव जय महाकाल ॐ

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